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आओ मानवतावाद इन्सानियत की राह पर चले

नमस्ते, सलाम, ग्रीटिंग्ज! वुई-ह्युमॅनिस्टस् साईटपर आपका स्वागत है, इस्तकबाल है। इस वेलकम पोस्ट में आप के सामने मानवतावाद इन्सानियत से जुडे कुछ खयाल रखेंगे। चले शुरुआत करें।

अक्ल को तनकीद से फुरसत कहां?

तू इश्क़ पर आमाल की बुनियाद रख

प्रसिद्ध शायर इक्बाल के एक शेर या कविता का यह हिस्सा है। इसमें कई महत्वपुर्ण चीजे है जिनपर हमें भी गंभीरता से विचार करना होगा। सबसे महत्वपुर्ण बात यह है की इससे रॅशनल विचार की मर्यादायें स्पष्ट होती है।

अर्थात अल्लामा इक्बाल साहब वैचारिक दृष्टीसे इस्लामिस्ट विचारधारा के करीब जानेवाले थे। उनको लगता था की ब्रिटिश सत्ता को हटाकर इस्लामिस्ट शासनव्यवस्था कायम करना ही एक सबसे बडा और सबसे अच्छा मकसद है तब के भारतीय उपखंड में रहनेवाले मुस्लिम लोगोंके लिये। उसी मकसद को मद्देनजर रखते हुये इक्बाल साहबने बहोत काम किया, कई शेर लिखे, नज्मे लिखी। उसमें से एक में उन्होने लिखा है: “अक्ल को तनकीद से फुरसत कहां? तू इश्क़ पर आमाल की बुनियाद रख”। इसमें उनको इस्लाम की विचारधारा से इश्क अपेक्षित था।

मुझे यहां इक्बाल साहब के नजरिये पर जादा ध्यान नहीं देना है लेकिन हम इस से बहोत कुछ सीख सकते है। हमारे जीवन में इश्क़ याने प्रेम का महत्व बहोत अधिक है - रॅशनल विचार से तो बहोत अधिक। वैज्ञानिक दृष्टीकोनसे याने साइन्सी नजरियेसे भी देखा जाये तो हमें यह बात समझ आती है की प्रकृति/कुदरत* हमें हमारी जिंदगी का कोई खास मकसद तैय्यार कर के नही देती है। हां, कुछ मकसद जरूर मिलते है हमें प्रकृतिसे - जैसे कि, जिंदा रहना। लेकिन हमारी निजी जिंदगीसे बढकर कोई भी मकसद हमें प्रकृतिसे पुरी तरह बनकर नहीं मिलता दिखाई देता है। अर्थात हर कोई व्यक्ती किसी भी चीज को उसके जिंदगीका सबसे बडा और सबसे खास मकसद बना सकता है, प्रकृतिने कुदरतने हमें यह स्वातंत्र्य जरुर दिया है। प्रकृतिको इससे कोई खास फरक पडता नहीं दिखता की हम आप किस चीज को जिंदगीका सबसे बडा और सबसे खास मकसद बना लेते है। जैसे की ज्ञानसाधना करना, क्रिकेट खेलना, शेफ बनना, ट्रेकिंग करना, बाईकपर सैर करना, माऊंटन्स चढना, गाना बजाना करना, डॉक्टर बनना, सैनिक बनना, व्यापारी बनना, राजा बनना, ऍक्टर बनना, वैज्ञानिक बनना, शिक्षक बनना, चांदपर जाना, मंगलग्रह पर जाना, गणित की कोई अनसुलझी समस्या पे काम करना, कुत्ते बिल्लीया पालना, रास्तोंपर भटकते गाय कुत्ते बिल्लीया गधे आदि पशुओंकी सेवा करना, बाघ शेर हिरन आदि जंगली पशुओंको बचाना, नई अधिक अच्छी दवाईंया खोजना, किसी ने खोजी हुई दवाईंया बेचकर ढेर सारा पैसा कमाना, बहोत बडा घर बनाना, घर में टेरेस गार्डन बनाना, बहोत बडी महंगी शादी करना, राजकीय नेता बनना, ढेर सारा पैसा कमाना, लोकतंत्र के लिये काम करना, बिल गेटस् या मार्क झुकेरबर्ग आदि के लिये काम करना, खुद बिल गेटस् या मार्क झुकेरबर्ग जैसे बनना, किसी खुदा ईश्वर गॉड को मानते हुये उनकी भक्ती, इबादत, सेवा करना, ज्ञानी आलीम बनना, या जिंदगीभर ऐशोआराम से दुनियाभर के टुरिस्ट ठिकानों की सफर, अय्याशी और पार्टियां आदि करना। तो हम समझ सकते है की इसमेंसे किसी भी या ऐसे दुसरे किसी भी कार्य को कोई व्यक्ती उसके जिंदगीका सबसे बडा और सबसे खास मकसद बना सकता है।

तो हम देख सकते है की हम इसमें से किस कार्य को किस चीज को हमारे जिंदगीका सबसे बडा और सबसे खास मकसद बना लेते है इससे प्रकृतिको कुदरतको कोई खास फरक पडता नहीं दिखता है। हां, प्रकृतिमें कुछ चीजे बदल जरूर जाती है जैसे की जंगल का कम होना या प्रदूषण का बढना या ग्लोबल वॉर्मिंग आदि और उस हिसाब से हम कह सकते है की प्रकृतिको कुछ फरक तो जरूर पडता है। यह बात मान्य है लेकिन मेरा कहना यह है की इन में से कौनसे बदलाव हमारी इन्सानी जिंदगी के लिये अच्छे है और कौनसे बुरे इसके लिये प्रकृति कुछ खास गंभीरतासे सोचती है और हमें साफ मार्गदर्शन करती है, कोई अच्छी राह, जो हमें आसानीसे समझ आये, ऐसी राह हमें बताती है ऐसा दिखता तो नही है।

प्रकृति कुदरत को हमारे ध्येय से क्या कुछ खास लेना देना है?

इस बाबत यह देखना महत्वपुर्ण है की जिस दर्दनाक तरह से अनेक प्राणी जानवर आजतक मरे है, आज भी मरते है, यहांतक की अनेक प्रजातियां, नस्ले बिल्कुल नष्ट तक हुई है; लेकिन प्रकृतिने कुदरतने उनकी जिंदगी बचाने के लिये या उनके दर्द को मिटाने के लिये कुछ खास कार्य किया ऐसे दिखता नही है। अगर आप को ऐसा कुछ दिखता है तो जरूर बताये। हां, धार्मिक मजहबी लोगों की तरह आप हम यह मान जरूर सकते है की “जो कुछ हो रहा है वो सब हमारे भले के लिये, अच्छे के लिये ही हो रहा है”, लेकिन फिर दर्द की और दर्द मिटाने की बात करना भी फिजुल ही होगा। इसलिये कृपया ऐसे विचार ना रखियेगा सामने। ऐसी दलील कुछ काम की नही है।

तो हम देख सकते है की हम आप किस चीज को हमारे जिंदगीका सबसे बडा और सबसे खास मकसद बना लेते है और इससे जो कुछ फरक पडता है उसे लेकर इन्सानों को ही फिकरमंद या चिंतित होना जरूरी है। तो हम यह स्पष्ट करना चाहते है की हम इन्सानो के दर्द को लेकर चिंतित है। इसीलिये यह मानते है की इन्सानो के जितने भी दर्द है उनको हो सके उतना कम करने के लिये कोशिश करना यह हमारे जिंदगीका एक काफी बडा और काफी खास मकसद होना चाहिये।

लेकिन एक आदमी इस बाबत बहोत जादा कुछ नहीं कर सकता है - वो चाहे कितना भी टॅलेंटेड क्यों न हो, कितना भी बुद्धिवान, अक्लमंद क्यों न हो, कितना भी शक्तिमान क्यों न हो, कितना भी हिकमतवाला या हुनरबाज क्यों न हो, कितना भी धनवान क्यों न हो, कितना भी धार्मिक मजहबी श्रद्धालु क्यों न हो, वो इस बाबत बहोत जादा कुछ नहीं कर सकता है। इसके लिये पुरे समाज से मदद सपोर्ट मिलना बेहद जरूरी है। यह तभी संभव है जब समाज के बहोत बडे हिस्से को यह लगे की इन्सानो के जितने भी दर्द है उनको हो सके उतना कम करने के लिये कोशिश करना यह हमारे जिंदगीका एक बहोत बडा और बहोत खास मकसद होना चाहिये। क्योंकि अगर हम हमारे लिये एक अच्छे समाज का होना महत्वपुर्ण मानते है तो हमें यह बात अच्छे से जाननी होगी की हर किसी का किसी भी मनमानी चीज को खुद के जिंदगीका सबसे बडा और सबसे खास मकसद बना लेना एक बहोतही खतरनाक चीज है।

क्या इसका मतलब यह है की व्यक्ति को यह स्वातंत्र्य होना ही नही चाहिये कि उसके खुद के जिंदगीका मकसद वो खुद तय भी ना करें? क्या व्यक्ती को इस बाबत कुछ भी आजादी नही होनी चाहिये?

यह मसला ही पश्चिमी लिबरल विचारधारा और धार्मिक/मजहबी विचारधाराओंके बीच के प्रमुख टकराव का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। वैसे देखा जाये तो इस हिसाब से प्रचलित कम्युनिजम् भी धार्मिक विचारधाराओंके ही नजदिक जाता है। प्रचलित कम्युनिजम् में भी व्यक्तिगत स्वातंत्र्य को लगभग नकारा ही गया है।

व्यक्तिगत स्वातंत्र्य के महत्व को नकारा नही जाना चाहिये क्योंकी व्यक्तिगत स्वातंत्र्य के अभाव में वैज्ञानिक प्रगती साइन्सी तरक्की होना लगभग असंभव है। इन्सानो के अनेक दर्द कम करने के लिये या लगभग मिटाने तक के लिये वैज्ञानिक प्रगती बेहद जरूरी है। जैसे की औषधी, व्हॅक्सिन, टीका, लेन्स (ऐनक), कृत्रिम दांत, या टुथपेस्ट जैसी चीजे। और ऐसी चीजे ही क्यों? हम आज घर बैठे जो अन्न खाते है, खेतो में अनाज उगाते है, आज घर में रहते है, जो कपडे पहनते है, आज घर में बैठे आसानीसे पानी पिते है यह सब चीजे भी हमारे कई तरह के दर्द मिटाने के लिये बेहद महत्वपुर्ण है। इन सब चीजों के लिये वैज्ञानिक प्रगती बेहद जरुरी है क्योंकी इन सबके लिये जो ज्ञान/इल्म लगता है वो ज्ञान वो इल्म प्रकृति/निसर्ग/कुदरत हमें बनेबनाये आसानीसे नहीं देती है। यह ज्ञान यह इल्म ये सब इन्सानों ने अपने खुद के अक्ल के इस्तेमाल और एकदुसरे की मदद से बनाया है। अगर इन्सान को खुद की अक्ल के (बुद्धी के) इस्तेमाल की आजादी ना होती तो यह ज्ञान इन्सान कभी बना नही सकते थे, और शायद कभी खोज भी नहीं सकते थे।

तो हम समझ सकते है की समाज के वैज्ञानिक प्रगती के लिये व्यक्तिगत स्वातंत्र्य एक बेहद जरूरी चीज है।

लेकिन फिर कम्युनिजम् और धार्मिक/मजहबी विचारधाराओं को माननेवाले लोगोंने व्यक्तिगत स्वातंत्र्य का विरोध क्यों किया है?

इसका एक मुख्य कारण, जो हम एक अच्छा कारण भी मानते है, वो कुछ इस प्रकार है: व्यक्तिगत स्वातंत्र्य का उपयोग इस्तेमाल अगर व्यक्ती खुदगर्ज तरिके से सिर्फ खुदके किसी निजी मकसद को पाने के लिये करने की संभावना बहोत जादा होती है। अगर लोग ऐसा करने लगे तो यह हमारे समाज के लिये एक अच्छी बात नही होगी। हमारे निजी मकसद के साथ साथ समाज के दुसरे लोगों का खयाल करना यह हमारा एक महत्वपुर्ण मकसद होना ही चाहिये। क्योंकि इसके बिना कोई भी इन्सान दुसरे के लिये खुद के किसी भी मकसद की खुद की मर्जी से और खुशीसे कुर्बानी दे ही नही सकता है, खुदके किसी भी ध्येय का त्याग खुद की मर्जी से और खुशी से कर ही नही सकता है। ऐसे त्याग, कुर्बानी के लिये खुदगर्जी से उपर उठकर हमारा कोई दुसरा मकसद होना चाहिये। ऐसे मकसद से, ऐसे ध्येय से भी हमें बेहद इश्क होना चाहिये।

ऐतिहासिक घटनाओंका वैज्ञानिक दृष्टीसे अभ्यास करनेपर हमें पता चलता है की धर्म, रिलिजन, मजहब भी ऐसे ही मकसद बनाने की इन्सानी कोशिश का एक नतीजा दिखाई देते है। लेकिन पुराने जमाने के व्यक्तिको समाज के लिये कुछ त्याग करने के लिये प्रेरित करने के लिये कुछ लोगोंने गॉड, ईश्वर, भगवान, निर्मिक, निर्माता, खुदा, अल्लाह, याहवेह, बाल आदि की कल्पनायें लोगों के सामने रखी - इन्ही कल्पनाओं की आड में एक धार्मिक मजहबी रिलिजियस मकसद रचा गया होगा। इस धार्मिक मजहबी रिलिजियस मकसद को ही खुद के जिंदगीका सबसे बडा और सबसे खास मकसद बनाने के लिये लोगों को प्रेरित भी किया।

शायद आपके खयाल में यह सवाल आया होगा की इन सबका इक्बाल के उस शेर से क्या लेना देना?

तो चले अब हम यह बात भी देखते है। किसी चीज का हमारी मकसद या ध्येय होना इसका मतलब क्या होता है? किसी चीज का हमारा मकसद या ध्येय होना इसका मतलब होता है हमें वो चीज बहोत महत्वपुर्ण भी लगती है और अच्छी याने इश्क करने लायक भी लगती है। अधिक गहराईसे देखे तो हमारे ब्रेन का वो हिस्सा, जो रॅशनल तार्किक सोच की ताकत क्षमता रखता है, जिसे हम अक्ल कहते है, हमारे ब्रेन का वो हिस्सा हमें जादातर तनकीद याने कटाक्ष करने के लिये ही प्रेरित करता है। एक तरफ से देखे तो तनकीद करने की ताकत वैज्ञानिक प्रगती के लिये बेहद जरूरी भी है क्योंकि अगर बगैर तनकीद या चिकित्सा किये कुछ भी ज्ञान या इल्म हम स्वीकार करेंगे तो हम हमारे ज्ञान में कुछ भी सुधार या बदलाव नही कर पायेंगे।

फिर अक्ल को हम हमारे आमाल याने व्यवहार की बुनियाद क्यों ना बनाये?

क्योंकि फिर हमारा पुरा व्यवहार केवल एक व्यापार जैसा व्यवहार ही बनकर रहेगा। एकबार समाज ऐसे व्यापारी बनिया सोच की गिरफ्त में आ गया तो ऐसे समाज का बचना फिर मुश्किल है - वो पुरा समाज फिर एक बडी मंडी या बाजार में बदल जायेगा। क्यों कि फिर हर चीज का दाम ढुंढने में ही लोग जादातर लगे रहेंगे। फिर बाजार में जिस चीज का जादा दाम होगा उसी चीज के पीछे लोग लग जायेंगे। जो चीज बाजार में नही बिकेगी या जिस चीज का दाम कम मिलेगा वो चीजे समाज से ही गायब होती जायेंगी।

इसलिये अगर हम एक अच्छा समाज बनाना चाहते है तो बेहद महत्वपुर्ण बात यह है की इन्सानों के साथ हमारा व्यवहार मूलतः प्रेम, करूणा और मैत्री की बुनियाद पर होना चाहिये ना की पुरी तरह केवल अक्ल [रॅशनल तार्किक सोच] की बुनियाद पर। याने दुसरे इन्सानों से इश्क, हमदर्दी और दोस्ती इनपरही हमारे आमाल की बुनियाद रखनी चाहिये।

चलो मान लेते है की कुछ लोग यह कहेंगे की हम इतनी सावधानी तो बरतेंगे की हम ऐसे बेतहाशा खुदगर्ज व्यापारी सोच के शिकार नही बनेंगे तो फिर अगर हम अक्ल [रॅशनल तार्किक सोच] को हमारे व्यवहार की बुनियाद नही बना सकते है? क्या अच्छे समाज के लिये वैज्ञानिक सोच को हमारे व्यवहार की बुनियाद बनाना गलत है?

यह बात मान्य है की वैज्ञानिक सोच का महत्व सिर्फ रॅशनल तार्किक सोच से कई‌ अधिक है क्यों कि वैज्ञानिक सोच हमें प्रकृति/निसर्ग/कुदरत के बारे में गंभीरता से सोचने के लिये प्रेरित करती है। लेकिन इन्सान का दुसरे इन्सान के साथ जो अच्छी मैत्री का नाता, अच्छी दोस्ती का रिश्ता जुडता है उसकी बुनियाद भरोसा और प्यार ही होती है, होनी भी चाहिये। जहांतक मेरा अभ्यास है मुझे लगता है की भरोसा और प्यार ये दोनो ही ज्ञान के दायरे से बहोत हद तक परे है क्यों कि ये दोनो ही रॅशनल तार्किक सोच के दायरे से परे है। वैज्ञानिक सोचसे भी देखा जाये तो भरोसा और प्यार ये दो चीजे कमसेकम हमें आज उपलब्ध ज्ञान के दायरे से तो परे है।

दुसरी अहम बात यह है की अक्ल [रॅशनल तार्किक सोच] की बुनियाद पर अपने व्यवहार की नींव रखनेवाला इन्सान भले लालची व्यापारी सोच रखकर पैसा कमाने की चाहत ना भी रखता हो लेकिन उसे ज्ञान की चाहत हो सकती है। ज्ञान की चाहत रखना कोई बुरी बात नही है लेकिन ज्ञान को जीवन का परम ध्येय या सबसे बडा मकसद मानना गलत है। जादातर ज्ञानसाधक लोग ऐसी मान्यता रखे दिखाई देते है। कुछ लोग पुछेंगे की इसमें क्या गलत है? इसमें गलत बात यह है की फिर ऐसा कोई व्यक्ती सिर्फ ज्ञानसाधना के लिये किसी बिल गेटस् या मार्क झुकेरबर्ग जैसे लोगों के लिये या हिटलर जैसे किसी मानवताविरोधी कार्य करनेवाले तानाशाह के लिये काम करने में जरा भी नही हिचकिचायेगा - उसको बस अपनी ज्ञानसाधना का खयाल होगा। आज हम देख सकते है की पाश्चात्य जगत के लगभग सारे ही विश्वविद्यालयोंके, कॉलेजेस के जादातर वैज्ञानिक, संशोधक, प्रोफेसर्स लोग ऐसे ही मकसद के पीछे लगे हुये है। इनमें से जादातर उच्चपदवीधारक एलिट लोगोंको दुसरे इन्सानो के दर्द का खयाल तक भी नही है यह साफ दिखाई देता है - ये लोग बौद्धिक मेरिट याने अक्ल के दीवाने होकर इन्सानियत भूल चुके हुये लगते है। ये बात बौद्धिक मेरिट तक भी सिमीत नही है, इसमें दुसरे अनेक हुनर, टॅलेंट्स, कौशल और कलायें आदि शामील है।

अगर हमें लगता है की “सभी इन्सानो के जितने भी दर्द है उनको हो सके उतना कम करने के लिये दुसरे इन्सानों के साथ मिलकर कोशिश करना” यह हमारे जिंदगीका एक बहोत बडा और बहोत खास ध्येय मकसद होना चाहिये तो इस ध्येय के लिये हमारे खयालों में प्रेम लगाव होना चाहिये, इस मकसद से हमें इश्क होना चाहिये। और इन्सानो के साथ हमारे व्यवहार की बुनियाद यही इश्क यही प्रेम होना चाहिये। अगर ऐसा होगा तभी हम इन्सानों के साथ हमारे व्यवहार में बेतहाशा खुदगर्ज नही बनेंगे, स्वार्थ से उपर उठकर सोचेंगे और फिर इन्सानो के साथ अच्छे रिश्ते बनाये रखने के लिये हमारे स्वार्थ का कुछ हिस्सा, हमारे मतलब का कुछ हिस्सा हम कुर्बान कर सकेंगे, त्याग सकेंगे।

सिर्फ अक्ल को अपने आमाल (याने व्यवहार) की बुनियाद बनानेवाला इन्सान ऐसी कुर्बानी क्या थोडी भी कर पायेगा? हरगिज नहीं। इतनाही नही, सिर्फ अक्ल को अपने आमाल की बुनियाद बनानेवाला इन्सान किसी दुसरे इन्सान से दी गई ऐसे किसी कुर्बानी की क्या कुछ कदर भी कर पायेगा? हरगिज नहीं। अक्लवाला इन्सान ऐसे इन्सान को पागल, मूर्ख मानेगा।

हम यहां जरूरतों की कुर्बानी देने की बात नही कर रहे है। आज भारत का ही विचार करें तो हमें हमारे संविधान के माध्यम से ऐसी समाज और शासन व्यवस्था तो जरूर मिली है की हमें अपनी जरूरतों की कुर्बानी देने की नौबत तो नहीं है, जैसे की ब्रिटिशशासन काल में थी।

तो फिर किस प्रकार के कुर्बानी की त्याग की जरूरत है?

अपने व्यक्तिगत स्वातंत्र्य को हर जगह और हर एक चीज से जादा अहमियत देना गलत है - लगभग सभी सामाजिक स्तरोंपर हमें अपने व्यक्तिगत स्वातंत्र्य की थोडीबहुत कुर्बानी देने की सख्त जरूरत है। अपने अनेक व्यक्तिगत अधिकारों की भी थोडीबहुत कुर्बानी देने की जरूरत है। और इससे जादा महत्वपुर्ण है अपने अनेक ख्वाहिशोंकी इच्छाओंकी, आकांक्षाओंकी कुर्बानी देने की जरूरत। क्यों?

क्योंकि अगर यह सब हम नहीं करेंगे तो हम एक अच्छा समाज जिसमें बहोतसे इन्सानों के दर्द बहोत हदतक वैसे ही बने रहेंगे। ऐसी छोटी छोटी कुर्बानियां देने की राह में भी, छोटे छोटे त्याग करने की राह में भी रॅशनल तार्किक विचार बहोत बडी बाधा उत्पन्न कर देता है, बहोत बडा रोडा बनकर खडा हो जाता है। रॅशनल तार्किक विचार करनेवाला इन्सान अपनी छोटी छोटी अय्याशीयां और छोटे छोटे ऐशोआराम भी कुर्बान नहीं कर पाता है। उदाहरण के तौर पर - अच्छी खासी नोकरी जॉब मिलने के बाद भी एक रॅशनल तार्किक विचार करनेवाला व्यक्ती अपने प्रमोशन की ख्वाहिश की कुर्बानी देने को तैय्यार नहीं हो पाता है। दुसरी ओर से जिस व्यक्ती को अच्छे से जांच परख कर जॉब पर लिया हो और वह व्यक्ती अपना कार्य अच्छे से कर भी रहा हो तब भी कंपनी का मालिक अगर एक रॅशनल तार्किक विचार करनेवाला हो तो वो उस एम्प्लॉयी से उस जॉब करनेवाले से और अधिक काम निकलवाने के ख्वाहिश की कुर्बानी देने को तैय्यार नहीं हो पाता है। आजतक जो व्यक्ती एक छोटे से मकान में रहने के लिये भी तरसनेवाला होता है वो अच्छी खासी नोकरी जॉब मिलने के बाद जब एक बडासा मकान ले लेता है तब भी अपनी दुसरी अनेक आकांक्षाओं में से एक की भी कुर्बानी देने के लिये तैयार नही हो पाता है अगर वो व्यक्ती रॅशनल तार्किक सोच को बहोत जादा अहमियत देता है तो।

यह बात सिर्फ अय्याशियां और ऐशोआराम तक सिमीत नहीं है।

उदाहरण के तौर पर - अच्छा खासा संशोधन करने के बाद भी रॅशनल तार्किक विचार करनेवाला कोई विद्यार्थी, अध्यापक, वैज्ञानिक संशोधक, कोई इंजिनियर जो भले ही जादा पैसा पाने की या प्रमोशन आदि पाने की ख्वाहिश ना भी रखता हो पर वो अधिक ज्ञान पाने की अपनी इच्छा, और जादा इल्म हासिल करने की अपनी ख्वाहिश की थोडी भी कुर्बानी देने को तैय्यार नहीं हो पाता है। क्रिकेट, टेनिस, या दुसरे ऐसे ही किसी खेल में रूची रखनेवाला इन्सान, जो भले ही जादा पैसा पाने की या प्रमोशन आदि पाने की ख्वाहिश ना भी रखता हो, पर वो ऐसे खेल के मॅचेस देखने की या खुद ऐसे खेल खेलने में अधिक एक्स्पर्ट कुशल बनने की अपनी इच्छा की कुर्बानी देने को तैय्यार नहीं हो पाता है। इसी तरह म्युजिक, डान्स या दुसरे ऐसे ही किसी कला में रूची रखनेवाला इन्सान एक फनकार जो भले ही जादा पैसा पाने की या प्रमोशन आदि पाने की ख्वाहिश ना भी रखता हो, पर वो ऐसे कला के प्रदर्शन प्रोग्राम कार्यक्रम देखने की या खुद ऐसे कला के प्रदर्शन करने की, उस कला में अधिक एक्स्पर्ट कुशल बनने की या रियाज सराव करने की अपनी ख्वाहिश की कुर्बानी देने को तैय्यार नहीं हो पाता है।ऐसा इन्सान लगातार अपने ऐसे ही कार्य में, जो उसे प्यारा लगता है, उसी में‌ डुबा रहता है, उसी में‌ डुबे रहना चाहता है। क्या ऐसा इन्सान खुद को प्यारी अपनी कुछ ख्वाहिशोंको नजरअंदाज कर समाज के लिये, दुसरे इन्सानों के दर्द के बारे में कभी सोच भी पायेगा? हरगिज नहीं।

यह बात सिर्फ अय्याशियां, ऐशोआराम और ख्वाहिशोंके तक भी सिमीत नहीं है। अक्सर इन्सान अपने हक अपने अधिकारों की ओर बहोत जादा ध्यान देता है, जो कि कुछ हद तक महत्वपुर्ण भी है। लेकिन अगर इन्सान अपने हक अपने अधिकारों के बारे में ही जादा सोचता हो तो वो अपने कर्तव्य अपने फर्ज बिल्कुल ही नहीं निभा पायेगा। कई बार इन्सानियत के लिये हमें अपने कई अधिकार और हक की भी कुर्बानी देनी पडती है।

इसलिये हमें यह भी जानना चाहिये की अक्ल को सिर्फ तनकीद से फुरसत नही मिलती है ऐसा नही है, रॅशनल तार्किक सोच, जो कि अक्ल का एक अहम हिस्सा है, उसके चलते अक्ल ही इन्सान की जरूरते हद से जादा बढाने में लगी रहती है। तो हम यह भी कह सकते है की ऐसी अक्ल को खुदगर्जी से भी फुरसत नहीं मिल सकती है। अर्थात हक अधिकार के बारे में दक्ष रहना इसे खुदगर्जी नहीं माना जाना चाहिये, लेकिन कर्तव्य को भूलकर अधिकार के बारे में सोचना खुदगर्जी ही है।

तो इसका मतलब क्या हमें वैज्ञानिक दृष्टीकोन, जिसके लिये रॅशनल तार्किक विचार की जरूरत होती है, उसे भी छोड देना चाहिये?

हरगिज नहीं। इसकी बहोत गहराईसे चर्चा हम यहां पर नहीं करेंगे लेकिन यहांपर संक्षेप में इसे बताते है। यह जानना जरूरी है की वैज्ञानिक दृष्टीकोन और वैज्ञानिक सोच के लिये रॅशनल तार्किक विचार करने की जरूरत तो होती है लेकिन वह एक सीमा तक, एक हद तक ही होती है। यह सीमा, यह हद क्या होती है इसके बारे में भी अब हम बहोत कुछ जान चुके है।

इस संदर्भ में यहांपर मुझे एक विचार याद आता है, जो शायद आईन्स्टाईन ने बताया था -

(in scientific pursuits) knowledge is important but imagination is more important than knowledge

याने “वैज्ञानिक, तकनिकी आदि किसी भी संशोधन में ज्ञान, इल्म तो महत्वपुर्ण है लेकिन उससे जादा महत्वपुर्ण है हमारी कल्पना करने की शक्ती”। ऐसा क्यों? क्योंकि कई बार ऐसा होता है की प्रकृति/कुदरत के बारे में हमें अबतक मालुम हुये ज्ञान, इल्म में सुधार लाने की जरूरत होती है; खासकर तब जब हमारे सामने प्रकृति/कुदरत की कुछ नयी घटनायें सामने आ जाती है। तो उन नयी घटनाओं का सामना करने के लिये, उनको जादा गहराई से जानने की जरूरत होती है। इसके लिये कई बार हमारा पुराना ज्ञान, इल्म हमें मदद करने में नाकामयाब होता है। तब हमें नयी कल्पनायें कर के ही नया ज्ञान, नया इल्म बनाना पडता है इसे हम नयी थ्योरिज, नया सिद्धांत, नया दावा या नये नजरिये के तौर पर हमारे सामने लाते है।

याने जब पुराना ज्ञान, इल्म नाकामयाब होने लगता है, तो उसके बाद वैज्ञानिक दृष्टीकोन के मुताबिक हम सिर्फ और सिर्फ कल्पनाओं के याने की खयालों के आधार पर ही आगे बढने की कोशिश कर सकते है।

अक्ल को तनकीद से फुरसत कहां?

तू इश्क़ पर आमाल की बुनियाद रख

जैसे हमने पहले ही देखा इक्बालसाहब को इस्लामिस्ट सोच से इश्क अपेक्षित था। लेकिन उनके द्वारा लिखी गई इन दो पंक्तियों में‌ जो अर्थ है वो बहोत गहरा है। लेकिन इसका मतलब यह नही है की हमें हमारे आमाल अक्ल को पुरी तरह नजरअंदाज कर के ही करने है। हमें इक्बालसाहब से उनकी इस्लामिस्ट सोच (या ऐसी ही दुसरी कोई धार्मिक मजहबी या राजकीय सोच) के पीछे अंधा हो जाने की जो चाहत दिखाई देती है वो नही लेनी है। हमें ना तो अक्ल से दुश्मनी लेनी है और ना ही वैज्ञानिक दृष्टीकोणसे दुश्मनी लेनी है; हमें मानवतावाद से इन्सानियत से इश्क को हमारे व्यवहार की मुख्य बुनियाद बनाकर फिर हमारी अक्ल को उस ध्येय के लिये उस मकसद के लिये इस्तेमाल करना है। हमारी विज्ञान से कोई दुश्मनी नही है, जैसे की किसी ऐसे इन्सान की हो सकती है जो किसी ऐसे धार्मिक, मजहबी, रिलिजियस सोच को मानता हो जो किसी धर्मग्रंथ को आखरी और पुरा मुकम्मल सच मानता हो।

तार्किक सोच की मर्यादा (On the limits of rationality):

तो हम इक्बालसाहब के इस शेर में थोडी तबदिली कर आपके सामने पेश करते है:

अक्ल को खुदगर्जी से फुरसत कहां?

तू इश्क़ पर आमाल की बुनियाद रख

अक्ल को तनकीद से फुरसत कहां?

तू इश्क़ पर आमाल की बुनियाद रख

अर्थात ऐसा इश्क़ हमें मानवतावाद से, इन्सानियत से करना होगा - तभी हम खुदगर्जी से उपर उठकर दुसरे इन्सान के दर्द के बारे में अच्छे विचार, अच्छे नजर से और हमदर्दी से सोच पायेंगे और तभी हम तनकीद से उपर उठकर दुसरे इन्सान की छोटी से छोटी गलतियोंपर ध्यान केंद्रित ना कर, उसकी भावनाओं के बारे में अच्छे विचार, अच्छी नजर से सोच पायेंगे और दुसरे इन्सानों को कुछ मदद करने की सोच तो सकेंगे। दुसरे इन्सानों को जो बन सके वो मदद करने की सोच रखेंगे तो ही कुछ मदद हम कर पायेंगे।

मानवतावाद इन्सानियत के लिये दुसरे इन्सानों से इश्क, हमदर्दी और दोस्ती इनपरही हमारे आमाल की बुनियाद रखनी चाहिये। इसका अर्थ जादा डिटेल में क्या होगा इसपर कुछ विचार हम किसी दुसरी पोस्ट में देखेंगे।

यह विचार पढने के लिये धन्यवाद शुक्रिया 🙏

आपका हमारे वेबसाईटपर फिरसे स्वागत है। हम आशा करते है की आपको हमारे विचार अच्छे और महत्वपुर्ण लगे हो। हम आपसे बिनती और गुजारिश करते है की आप हमारे इस विचार पर गंभीरता से संजीदगी से विचार करें, गौर ओ फिकर करें। आओ हम सब मिलकर मानवतावाद इन्सानियत की राह पर चले और इस राह पर चलने के लिये एकदुसरे की जो बन सके मदद करें।